कविता नई रचना ( बेखबर )

कल तक तुम्हारी हर सांसों की खबर थी।
आज तुम बेखबर हो।
माना तुम्हारा जाना तय था।
तुम्हारी मंजिल निश्चित थी,
बस एक शिकायत है तुमसे,
जाने से पहले
मुझे भी आजाद कर देते।
अपनी तरह!
उन्मुक्त परिंदो सा,
अपने घर के दहलीज से,
बांध कर तो न जाते।
क्या कहूँ तुम्हे!
जब भी घर से बाहर जाती हूँ ,
मेरे कानों में दूर से आवाज आती है,
जैसे घर बेचैन होकर मुझे बुला रहा हो।
घर का कोना कोना मुझे पुकारता है।
जैसे तुम्हारा दिल अब भी यही कही धड़क रहा है।
मेरे लिए!
शायद तुम्हें पसंद है,
मेरा तुम्हारे घर में रहना,
घर के आंगन में बैठना
और तुम्हारा गुनगुनी धूप सा,
आंगन में बिखर जाना।
शायद मखमली यादों को
जीने के लिए बार बार
किसी बहाने से
मेरे पास लौट कर आते हो,
यकीनन! अब भी तुम यहीं कहीं…..मेरे पास हो
फूलों में सुगँध सा

स्वरचित (राजश्री मृणालिनी)दिल्ली

Shares:
Post a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *