दिल्ली यूनिवर्सिटी शिक्षक संघ के अध्यक्ष से बातचीत

दिल्ली यूनिवर्सिटी ने वर्षो बाद देखा उजाला

सबको साथ लेकर चलना ही राष्ट्रीय सोच का परिचायक

“एक हाथ में सृजन दूसरे में हम प्रलय लिए चलते हैं सभी कीर्ति ज्वाला में जलते,हम अंधियार में जलते हैं”

दिल्ली दर्शनीय प्रिय

एक के भागी एक ऐसा नाम जो प्रेम और सौहार्द, सरलता, प्रबल, राष्ट्रप्रेम,सहजता और सपाट बयानी के आधार स्तंभ है। इनकी प्रतिभा तथा अनूठी कार्य क्षमता युगों तक आनेवालो को राह दिखाती रहेगी। जैसी इनकी सोच है वैसा ही जीवन।ऐसा आशावादी व्यक्तित्व जिनसे प्रेरित होकर चित्रकार तूलिका उठा ले, कवि साहित्यकार लेखनी और शौर्यवान योद्धा तलवार।उनकी सोच नए कल और परिवेश की निर्मात्री है। आप उनसे मिलते हैं तो इस उम्मीद से भर जाते हैं कि जड़ता की परतें घटेंगी,एक पवित्र मन जागेगा और बदलाव आएगा।
डूटा यानी दिल्ली यूनिवर्सिटी शिक्षक संघ के अध्यक्ष पद पर दूसरी बार काबिज हुए एके भागी सहज रूप से अपने सेवा कार्य को आगे बढ़ा रहें हैं। 3000 से भी अधिक पदोन्नतियां और 2700 से ज्यादा तदर्थ शिक्षकों को नियमित करने का बीड़ा कोई यूं ही नहीं उठाता।इसके लिए अटल हिम्मत और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है। डॉ दर्शनी प्रिय ने हाल ही में उनसे बात कर विश्विद्यालय परिसर की मौजूदा स्थिति समझने की कोशिश की:

प्रश्न
“मैं तो समष्टि के लिए व्यष्टि का, कर सकता बलिदान अजय” यह पंक्तियां आप पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं।लोग आपकी अनूठी कार्य क्षमता का लोहा मान रहे हैं कैसे संभव कर दिखाया आपने?

उत्तर
देखिए मैं एकला चलो की रणनीति पर काम नहीं करता। मैंने संगठनात्मक रूप से सबको अपने साथ जोड़ा।इससे पहले जो भी शक्तियां यूनिवर्सिटी कैंपस में काबिज थी उन्हें अपने विचारों और आदर्शों की दृढ़ता से पीछे किया। उसके बाद एनईपी जैसे मुद्दे के सकारात्मक बिंदुओं पर शिक्षकों के साथ चर्चा, लंबे समय से पढ़ा रहे प्रतिभाशाली तदर्थ शिक्षकों का नियमितीकरण,पेंशन तथा मेडिकल आदि से जुड़े मुद्दे को सिरे से उठाया। समय तो लगा लेकिन लोग धीरे धीरे हमारी बात सुनने लगे और आज नतीजा आपके सामने है।

प्रश्न: डूटा ने स्व विवेक से आपको पुनः अध्यक्ष पद दिया है, इस नए कार्यकाल के नए संकल्प क्या हैं ?

उत्तर: देखिए डूटा के समक्ष अभी तीन सबसे बड़ी चुनौतियां हैं।पहला एनपीएस में आनेवाले सभी नए शिक्षकों को पेंशन के तौर पर कुछ राशि दिलाना क्योंकि आज हर व्यक्ति को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा चाहिए। मुझे भी चाहिए और आपको भी चाहिए।ऐसे में हमारे शिक्षकों के लिए पेंशन की व्यवस्था हो।दूसरा तदर्थ शिक्षकों के कार्यानुभव को अनुभव वर्ष के रूप में जोड़ा जाना और तीसरी बड़ी चुनौती दिल्ली सरकार के अंतर्गत आनेवाले कॉलेजो में शिक्षकों की नियमित भर्तियां करना ताकि विकास के दौर में वे पीछे न छूट जाए। इन महत्वपूर्ण कार्यों को हमने अपने लक्ष्य सूची में सबसे शीर्ष पर रखा है।इस बाबत हमने दिल्ली के एलजी को अनुरोध पत्र लिख कर उनका ध्यान आकृष्ट किया है।

प्रश्न
दिल्ली यूनिवर्सिटी के दयालसिंह कॉलेज से डूटा अध्यक्ष बनने तक का सफर कितना संघर्षमय रहा?
उत्तर
निश्चित ही कड़ा संघर्ष रहा। लेकिन हमारी एक प्रतिबद्धता थी।वो जो एक राष्ट्रीय सोच है हमारी उसे लेकर हमने कोई जल्दीबाजी नहीं की। हम उसी सोच के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे। पहले हमने एग्जीक्यूटिव और अकादमी काउंसिल में जीत हासिल की फिर हम डूटा का चुनाव जीते।लोगो ने हमारी प्रो एजुकेशनिष्ट की सोच को सराहा।केवल शिक्षकों के मोर्चे पर नहीं बल्कि शिक्षा में भी सुधार को लेकर हमने कार्य किया। हम सबको साथ लेकर चलते रहे। हमारी सरकार की जो सोच है कि सबको साथ लेकर चलें, बहुत ही सकारात्मक है, लोगों ने खुलकर हमारी इस सोच को सराहा।हम स्टेकहोल्डर को लेकर आगे बढ़े। यूनिवर्सिटी की समस्यायों पर पर हमने खुलकर चर्चा की। छात्रों के हित में काम किया।शिक्षक क्या कहते हैं उसे भी सुना।सबको आगे बढ़ने का मौका दिया।बदलाव में सबको साथ लेकर चलना आसान नहीं होता। यूनिवर्सिटी के अंदर 70 कॉलेज है।सब की अपनी समस्याएं है, सब की अपनी मांग है। सबको समग्रता में सुनना और साथ लेकर चलना टेढ़ी खीर थी लेकिन फिर भी हमने किया।

प्रश्न

विश्व के कई विश्वविद्यालय एक बेहतर शोध संस्थान के रूप में विकसित हो टॉप रैंकिंग में अपना स्थान बना रहे हैं ऐसे दिल्ली यूनिवर्सिटी एक मॉडल यूनिवर्सिटी के रूप में अपनी साख कैसे बनाए रखे?

उत्तर
आपने ठीक कहा बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दौर में हम सबको अद्यतन बने रहना होगा।हमारे शिक्षकों और छात्रों को भी बदलाव के साथ आगे बढ़ना होगा लेकिन ये ध्यान जरूर रखें कि बदलाव के साथ कहीं बह न जाए। अपनी साख को मजबूती से कायम रखते हुए हमे नैक रैंकिंग में स्थान बनाने की तैयारी करनी होगी। दुनियां के प्रीमियर संस्थानों के साथ मिलकर नवाचार तरीकों पर भी काम करना होगा तभी हम विश्व रैंकिंग में अपना स्थान बना पाएंगे।आज भारत की बात पूरी दुनिया सुन रही है।और मुझे लगता है किसी भी विश्वविद्यालय को विश्व रैंकिंग में लाने का सबसे उच्च मानदंड ये होना चाहिए कि वह विश्विद्यालय आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित बच्चों को कितना और कैसे स्थान देता है। दिल्ली विश्विदालय की सबसे अच्छी बात ये है कि यह समावेशीकरण की नीति पर चलती है और यही भाव हमें श्रेष्ठ बनाता है।

प्रश्न

क्या यह सच है कि दिल्ली विश्वविद्यालय आर्थिक समस्या से जूझ रही है। इसके नवीनीकरण और अन्य कॉलेज खोलने को लेकर क्या योजना है?

उत्तर

देखिए केंद्र द्वारा वित्तपोषित कालेजों पर तो ये बात लागू नहीं होती। हां, दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले 12 कालेजों में ऐसी स्थिति है, वहां फंड की कटौती हुई है।शिक्षकों का नियमितीकरण हो, वहां अवसंरचनात्मक विकास के लिए ग्रांट मिले ताकि जो स्टेक होल्डर है उनका नुकसान न हो इसके लिए निधि की आवश्यकता है। हमने केंद्र और दिल्ली सरकार से भी ये अनुरोध किया है कि ग्रांट की व्यवस्था हो ताकि शिक्षको को नियमित किया जा सके।इन कॉलेजों ने उच्च श्रेणी में आने के लिए जी तोड़ मेहनत की है।, नैक और आइएफबी की भी टॉप लिस्ट में वे शामिल है।ऐसे में धन की कमी से वे पीछे रह जाए ये उचित नहीं।

Shares:
Post a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *