खुराना जिन्होंने ज़ी थिएटर के टेलीप्ले ‘स्टैंड अप’ को निर्देशित किया है बता रहे हैं कि यह कहानी एक कॉमेडी से भी कहीं बढ़ कर क्यों है_

आकर्ष खुराना के लिए, कहानी सुनाना रोमांच से भरी एक अंतहीन यात्रा है और उन्होंने छोटे और बड़े पर्दे पर अपनी अनूठी शैली की छाप छोड़ी है। ‘कारवां’ और ‘रश्मि रॉकेट’ जैसी फिल्मों के निर्देशक के पास थिएटर का भी व्यापक अनुभव है और ‘स्टैंड अप’ सहित उनके कई टेलीप्ले ज़ी थिएटर के समृद्ध भंडार में मौजूद हैं। ‘स्टैंड अप’ के निर्देशन की प्रक्रिया के बारे में बताते हुए, आकर्ष कहते हैं, “नाटक उन लोगों के बारे में है जो अनूठे व्यक्तिगत और व्यावसायिक मुद्दों से निपट रहे हैं। सेटिंग चाहे जो भी हो, यह एक प्रासंगिक विषय है। कहानी अंत में, चुटकुलों के बारे में नहीं है बल्कि स्वयं एक मजाक बने बिना हास्य पैदा करने के बारे में है।”

‘स्टैंड अप’ पांच नवोदित स्टैंड-अप कलाकारों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक बड़े ओपन-माइक कार्यक्रम की तैयारी के लिए अपने गुरु से मिलते हैं। जब वे मजाकिया होने की कोशिश कर रहे होते हैं तो उन्हें एहसास होता है कि मजाक का पात्र बने बिना चुटकुला सुनाना कितना कठिन है। मुंबई के ‘कॉमेडी स्टोर’ में स्टैंड-अप कलाकारों के साथ बातचीत करते समय आकर्ष के मन में यह कहानी उभरी और वे कहते हैं, ”उस दौरान जब मैं और मेरे साथी तन्मय भट्ट, रोहन जोशी और आशीष शाक्य जैसे स्टैंड-अप कॉमिक्स के साथ ग्रीन रूम साझा कर रहे थे, मैंने देखा कि वे मंच के पीछे काफी संजीदा रहते थे।अक्सर कहा जाता है की कॉमेडी एक गंभीर विषय है और वाकई उन्हें देख कर ऐसा ही प्रतीत हुआ ।”

चूंकि ‘स्टैंड अप’ के अधिकांश पात्र संघर्षरत स्टैंड-अप कॉमेडियन हैं, इसलिए कुछ हंसी मज़ाक तो होना ही था, लेकिन आकर्ष का कहना है कि उनका अंतिम लक्ष्य ये नहीं था। वह बताते हैं, “लक्ष्य वास्तव में एक प्रतिस्पर्धा से ग्रस्त समूह के बारे में नाटक लिखना था जो हास्य के ज़रिये आजीविका कमाने की कोशिश कर रहा है । मैं ये दिखलाना चाहता था की एक हास्य कलाकार की वास्तविकता हमेशा मज़ेदार नहीं होती है।आगे बढ़ने के लिए जिनसे उन्होंने बहुत कुछ सीखा है, या जिनसे घनी मित्रता है,
उनसे भी उन्हें प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। वे अपने दर्शकों को हंसाने के लिए बाध्य हैं और इस बात के नकारात्मक पक्ष भी हैं, जिन्हें मैं दिखाना चाहता था.”

आखिरकार, आकर्ष एक ऐसी कहानी रचने में कामयाब रहे जो सिर्फ हास्य के बारे में नहीं थी। वह बताते हैं, “जैसा कि मैंने पहले कहा था, यह नाटक वास्तव में हंसी के बारे में नहीं था । यह ऐसे लोगों के समूह के बारे में था जो स्टैंड-अप कॉमेडियन बनने के लिए रोमांचक अवसरों का पीछा करके अपने उबाऊ जीवन से दूर जाने की कोशिश कर रहे हैं। उस जीवन से अलग होने के लिए वे संघर्ष कर रहे हैं और तलाश रहे है ऐसा मौका जो एक नयी शुरुआत साबित हो सकता है।”

Shares:
Post a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *