स्वामी रामानंदाचार्य जन्मभक्ति मार्ग से राष्ट्र जागरण अभियान चलाया…

बलपूर्वक मतान्तरित लोगों की घरवापसी भी….

स्वामी रामानंदाचार्य शंकराचार्य भक्ति परंपरा के जन्मदाता संत थे । उनका जन्म ऐसे कालखंड में जब भारत का राष्ट्रीय और सांस्कृतिक भाव दोनों विखंडित हो रहे थे । आक्रांताओं का विध्वंस चरम पर था । भारत के सभी मानविन्दुओं का मान हरण हो रहा था । मथुरा, काशी, प्रयाग अयोध्या ही नहीं ओरछा, उज्जैन, विदिशा, चंदेरी, और भोपाल तक लूट और विध्वंस से मानों पूरा जन जीवन आक्रांत था । संस्कृति और राष्ट्र रक्षा संघर्ष के साथ प्राण बचाने और पेट भरने का संघर्ष उत्पन्न हो गया था । ऐसे में स्वामी रामानंदाचार्य जी ने भक्ति आँदोलन से न केवल विखरते भारतीय समाज को चैतन्य किया अपितु भारत राष्ट्र के स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा संघर्ष केलिये संगठित भी किया ।


भक्ति की चेतना से राष्ट्र और संस्कृति रक्षा का अभियान आरंभ करने वाले स्वामी रामानंदाचार्य जी का जन्म प्रयागराज में हुआ था । उनका जन्म माघ माह कृष्ण पक्ष की सप्तमी को हुआ जो इस वर्ष 2 फरवरी को है और कुछ विद्वान शुक्ल पक्ष की सप्तमी को भी मानते हैं। जन्मतिथि की भाँति उनके पास जन्म वर्ष पर भी मतभेद हैं। कुछ ईस्वी सन् 1299 और कुछ ईस्वी सन् 1300 मानते हैं। उनकी माता का नाम सुशीला देवी और पिता का नाम पुण्य सदन था। पिता वैदिक विद्वान थे । स्वामी रामानंदाचार्य जी को आध्यात्म और वैदिक ज्ञान दीक्षा अपने ही परिवार में मिली । आगे की शिक्षा काशी में स्वामी राघवानंद के श्रीमठ आश्रम में हुई । उन्होंने यहाँ वेद, पुराणों और अन्य धर्म शास्त्रों के अध्ययन के साथ अपने गुरू राघवानंद जी के मार्ग दर्शन में कठोर साधना भी की। गुरु आश्रम से विद्वत्ता और अलौकिक आत्मशक्ति प्राप्त कर सार्वजनिक जीवन में आये । और अपनी बौद्धिक और आध्यात्मिक शक्ति से जन सामान्य की समस्याओं का निराकरण करने लगे । इसके साथ ही समाज में जागरुकता और संगठित रहने का संदेश देते थे । स्वामीजी देश के वातावरण से बहुत चिंतित रहते थे । वह सल्तनतकाल का समय था जिसमें सनातन परंपराओं का सार्वजनिक अध्ययन, आध्यात्म साधना और सांस्कृतिक शिक्षा कठिन थी ।

तनाव, दबाव और भय के चलते भारतीय समाज जीवन का सारा ताना बाना बिखर रहा था । स्वामी जी को लगता था यदि ईश्वरीय आराधना बढ़े तो समाज का कष्ट दूर होगा । किन्तु आक्राताओं के भय से यज्ञ हवन या पूजन पाठ संभव नहीं हो पा रहा । इसलिए स्वामी जी ने एक मार्ग निकाला । वह था भक्ति मार्ग। इसके लिये किसी स्थान विशेष या किसी साधना केन्द्र की आवश्यकता नहीं थी । उन्होंने समझाया कि बिना किसी मंत्र या शिक्षा के मानसिक या मौन साधना भी हो सकती है । पूरा या आधा नाम स्मरण की भक्ति से भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है । उन्होने भक्ति के नौ प्रकारों की बहुत सरल व्याख्या की जिससे समाज जुड़ने लगा । स्वामी रामानंदाचार्य जी ने परिस्थियों को भाँप कर योग या ध्यान साधना के साथ एकाग्र चित्त होकर मानसिक भजन केलिये राम नाम स्मरण का मार्ग सुझाया । उन्होने भारत भर की यात्रा की और विभिन्न मठ, पंथ, समाज, वर्ग और वर्ण के प्रमुख जनों से संपर्क किया । संतों संयासियो पुरोहितों और पुजारियों से राष्ट्र जागरण के लिये भक्ति मार्ग से जोड़ा।

वे भक्ति मार्ग से दो कार्य करना चाहते थे । एक तो समाज सनातन परंपराओं से जुड़ा रहे और दूसरा संगठन और जाग्रति । आराध्य के प्रतीकों से समाज में कोई विसंगति न हो इसके लिये उन्होंने रामजी, कृष्णजी, हनुमान जी, देवी जी सभी स्वरूपों को जोड़ा और शिव परिवार को पूरक बताया । और सरलता केलिये रामभक्ति प्रमुख बताया। उन्होंने गृहस्थ और विरक्त दोनों प्रकार के भक्तों के नियम बनाये । विरक्त विरक्त संन्यासियों के लिए यम नियम के साथ समाज से संपर्क का दायित्व भी निर्धारित किया । वहीं गृहस्थ केलिये सरल भक्ति और सन्यासियों की सेवा सम्मान का दायित्व बताया। यद्यपि गृहस्थ और संयासियों के ये दायित्व नये नहीं थे । शास्त्रोक्त ही थे पर देशकाल और परिस्थितयों के अनुरूप कुछ सरलीकृत किया । उन्होंने अपने शिष्यों में समाज के सभी वर्गो और वर्णों से योग्य व्यक्तियों का चयन किया । इनमें अनंतानंद, भावानंद, पीपाजी, सेन नाई, धन्ना, नाभा दास, नरहर्यानंद, सुखानंद, कबीर, रैदास, सुरसरी, पद्मावती जैसे उनके प्रमुख शिष्य थे । जिन्हे द्वादश महाभागवत के नाम से जाना जाता है। इन सभी को अपने क्षेत्र में समाज को भक्ति के माध्यम से समाज जागरण का दायित्व सौंपा । इनमें कबीर दास, पीपा जी और रविदास जी ने आगे चलकर पूरे भारत में अपनी ख्याति अर्जित की ।

रामानंदाचार्य जी ने भक्ति के लिये निर्गुण पंथ और सगुण पंथ दोनों धाराओं से समाज को जोड़ा । जहाँ संभव हो वहां मूर्ति या किसी प्रतीक के समक्ष भक्ति और जहाँ संभव न हो वहाँ केवल मानसिक रूप से राम नाम का स्मरण किया जा सकता है । इसलिए कबीर दास जी और रविदास जी ने निर्गुण पंथ अपनाया जबकि निर्हर्यानंद जी और भावानंद जी सगुण मार्ग अपनाया । अन्य शिष्यों ने दोनों मार्ग अपनाये। इस प्रकार द्वैत, अद्वैत और विशिष्टाद्वेत इन तीनों परंपराओ भक्ति रस प्रभाहित हुआ । इस तरह स्वामी रामानंदाचार्य जी ने परिस्थतियों से विखर रहे देश को भक्ति मार्ग द्वारा राम नाम का स्मरण देकर स्वत्व का बोध कराया । इसी प्रकार वर्गों और वर्णों में परिस्थितिजन्य बढ़ती सामाजिक दूरियों में भी एकत्व का संदेश दिया । उन्होने भगवत् नाम की महत्ता चेतना के लिये समझाया और “सर्वे प्रपत्तेधिकारिणों मताः” का शंखनाद करके सबके लिये भक्ति का मार्ग पर चलने का आव्हान किया जो सनातन परंपरा की रक्षा के लिये आवश्यक था ।


आगे चल कर रामानंदी‌ पंथ की स्थापना हुई और उनकी अनुमति से उनके शिष्यों ने इस पंथ की शाखाएँ और उप शाखाएँ देश भर में फैलाईं। वस्तुतः यह रामानंद पंथ सनातन परंपरा से पृथक कोई नया पंथ नहीं था अपितु विध्वंसक आक्रांताओं द्वारा छिन्न-भिन्न की गई परंपराओं को पुनर्जीवित करने का एक प्रयास था । बाद में कुछ सीमाएँ कुछ बढ़ती गईं । अब वैष्णवों के 52 द्वारों में 36 द्वारे केवल रामानंदीय सन्यासियों और वैरागियों के हैं। यह सभी द्वारे स्वामी रामानंदाचार्य जी की शिष्य परंपरा ने ही स्थापित किया । यह राम नाम का भक्ति मार्ग ही था जिस पर आगे चलकर संत तुलसीदास जी ने रामचरित मानस की रचना की, अयोध्या, चित्रकूट, नाशिक, हरिद्वार ही नहीं देश भर में सैकड़ो मठ-मंदिर पुनर्जीवित हुये ।

काशी के पंचगंगा घाट पर स्थित श्रीमठ, दुनिया भर में फैले रामानंदियों का मूल गुरुस्थान बना । श्रीमठ ने ही आक्रांताओं के विध्वंस और आतंक के बीच राम भक्ति धारा को राज प्रसादों, पीडितों और वंचितों के मन मानस तक पहुंचाया । स्वामी जी की पवित्र चरण पादुकायें आज भी काशी के श्रीमठ में सुरक्षित हैं । जो संतों और भक्तों की आस्था का केन्द्र है। भजन स्मरण में लोकभाषा का मार्ग भी स्वामीजी ने ही निकाला था । उस समय संस्कृत का अध्ययन और अध्यापन कठिन हो रहा था । इसलिये जो जिस भाव भाषा को जानता था उसी भाव भाषा में भक्ति का संदेश दिया था । समाज संगठित रहे इसके लिये उन्होंने संदेश दिया कि- “जात पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई” ।


यह स्वामी जी के व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि सनातन समाज में समरसता का भाव जाग्रत हुआ । यह उनकी यौग शक्ति का ही प्रभाव था कि तत्कालीन शासक मोहम्मद तुगलक कबीरदास जी के माध्यम से स्वामी रामानंदाचार्य जी की शरण में आया और हिंदुओं पर लगे कुछ प्रतिबंध और जजियाकर को हटाने के निर्देश दिये। बलपूर्वक मुसलमान बनाये गये हिंदुओं को पुनः हिंदू धर्म में वापस लाने का कार्य भी स्वामी रामानंदाचार्य ने ही प्रारंभ किया था। ऐसे महान संत, परम विचारक, समन्वयी महात्मा स्वामी रामानंदाचार्य ने काशी के श्रीमठ में ही देह त्यागी । माघ शुक्ल पक्ष सप्तमी 1410 को देह त्यागी । उनकी जन्म-तिथि की भाँति उनके देह त्यागने की तिथि पर भी मतभेद हैं। पर उनका जीवनकाल 111 वर्ष रहा ।

उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की । जिनमें आनंद भाष्य पर टीका भी शामिल है। उनकी अन्य प्रमुख रचनाओं में वैष्णवमताब्ज भास्कर: (संस्कृत), श्रीरामार्चनपद्धतिः (संस्कृत), रामरक्षास्तोत्र (हिन्दी), सिद्धान्तपटल (हिन्दी), ज्ञानलीला (हिन्दी), ज्ञानतिलक (हिन्दी), योगचिन्तामणि (हिन्दी) और सतनामी पन्थ (हिन्दी) आदि प्रमुख हैं

लेखक
— रमेश शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार भोपाल

Shares:
Post a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *