प्रलेसं और स्टेट प्रेस क्लब ने”स्मरण” आयोजन में याद किया लेखकों को

इंदौर।साहित्यकारों को उनके जीवन काल में उतना सम्मान नहीं मिलता जिसके वे हकदार हैं। प्रोफेसर धनंजय वर्मा और मुनव्वर राना मानवीय मूल्यों के लेखक थे।

ये विचार व्यक्त किए गए दो दिवंगत साहित्यकारों की स्मृति में आयोजित “स्मरण” कार्यक्रम में। हिंदी साहित्य के प्रखर आलोचक प्रोफेसर धनंजय वर्मा एवं विख्यात शायर मुनव्वर राना की स्मृति में प्रगतिशील लेखक संघ इंदौर इकाई एवं स्टेट प्रेस क्लब, मध्य प्रदेश द्वारा अभिनव कला समाज सभागृह में आयोजित कार्यक्रम में भोपाल, उज्जैन, देवास के श्रोताओं और वक्ताओं ने भी शिरकत की।
दो सत्रों में संपन्न आयोजन के पहले सत्र को संबोधित करते हुए श्री वर्मा की विद्यार्थी रही रेखा कस्तवार ने उनके अनेक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि जीवन की तरह ही साहित्य में भी शॉर्टकट नहीं होता है। आलोचना और रचना एक दूसरे के पूरक होते हैं, विरोधी नहीं।

म. प्र. प्रगतिशील लेखक संघ अध्यक्ष मंडल के सदस्य, प्रोफेसर वर्मा के विद्यार्थी रहे शैलेंद्र शैली ने कहा कि इन लेखकों को याद करना मानवीय मूल्यों का स्मरण है। प्रोफेसर वर्मा ने अपनी शर्तों पर जीवन जिया, इस हेतु उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों को ठुकरा दिया था। उन्होंने ने जीवन के अनुभवों से मार्क्सवाद को समझा, इसी आधार पर वे वाम आंदोलन से आजीवन जुड़े रहे।

प्रोफेसर शोभना जोशी ने कहा कि वे प्रोफेसर वर्मा एवं कमला प्रसादजी की विद्यार्थी रही है। विडंबना है कि साहित्यकारों की मृत्यु के बाद ही उन्हें याद किया जाता है। धनंजय जी ने अपने लेखन में वैचारिकता को बनाए रखा था। वे माटी से जुड़े लेखक थे।

कार्यक्रम में प्रलेसं के प्रदेश अध्यक्ष प्रोफेसर सेवा राम त्रिपाठी द्वारा धनंजय वर्मा को दी गई श्रद्धांजलि का वाचन हरनाम सिंह ने किया। आयोजन में प्रोफेसर वर्मा की सुपुत्री निवेदिता भी सम्मिलित होने के लिए उज्जैन से आई थी।

दूसरे सत्र में प्रोफेसर अजीज़ इरफान ने मुनव्वर राना को याद करते हुए कहा कि “वे कहते थे कि देश विभाजन में पाकिस्तान तो जीत गया और देश के मुसलमान हार गए।” लोगों को परखने का उनका अपना नजरिया था। वे बुरे में अच्छाई को और अच्छों में बुराई को तलाश लेते थे। पत्रकार और अनुवादक जावेद आलम ने कहा की मुनव्वर राना की शायरी के अनेक पहलू सामने नहीं आ पाए हैं। उनकी लोकप्रिय शायरी ही मंचों पर सुनी गई है। वे प्रतिरोध के भी शायर थे। जावेद आलम ने मुनव्वर राना की शायरी के माध्यम से उनके व्यक्तित्व की जानकारी दी।

आयोजन का समाहार करते हुए प्रलेसं राष्ट्रीय सचिव मंडल के सदस्य विनीत तिवारी ने साहित्य के क्षेत्र में दोनों लेखकों के अवदान को याद किया। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति मुकम्मल नहीं होता, दिवंगत लेखकों की अच्छाइयों से सीखा जाना चाहिए। आलोचना के क्षेत्र में नामवर सिंह के बाद धनंजय वर्मा का ही नाम आता है। इस आयोजन में मुनव्वर राना का वह व्यक्तित्व सामने आया है जो अब तक नजरों से ओझल था। विनीत तिवारी ने कुमार अंबुज की कविता का वाचन भी किया।कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रलेसं इंदौर इकाई अध्यक्ष मंडल के सदस्य चुन्नीलाल वाधवानी ने कहा कि कट्टरता पुरानी बीमारी है इसके खिलाफ लेखकों को सामने आना चाहिए। उन्होंने सिंधी भाषा के कवियों के शेर भी सुनाएं।

दोनों सत्रों का संचालन करते हुए शशि भूषण ने कहा कि देश के हालात सबके सामने हैं। कठिन परिस्थितियों में दिवंगत लेखकों का स्मरण संबल प्रदान करता है। अतिथियों का स्वागत स्टेट प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने किया। आभार माना अभय नेमा ने।

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